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विगत कई वर्षो से गुरू- शिष्य परम्परा का आयेजन किया जा रहा है। इस योजना के अर्न्तगत शास्त्रीयगायन, नृत्य एवं लोक तथा जनजातीय कला विधाओं की प्रतिभाओं को आर्थिक सहायता प्रदान कर प्रोत्साहित किया जाता है । भारत सरकार के संस्कृति विभाग ने देश में विलुप्त हो रहे पारम्परिक कला विधाओं के लिए गुरू-शिष्य परम्परा का आरम्भ आर्थिकसहयोग प्रदान करने निर्णय पंचवर्षीय योजना में लिया। नई प्रतिभओं की खोज कर क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्रो द्वारा छात्रवृत्ति प्रशिक्षक एवं शिष्य को देने का निर्णय लिया है।
इस योजना के अर्न्तगत क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्र विभिन्न कला विधाओं और उनके विशेषज्ञों की खोज योजना के कार्यान्वयन के लिये करेंगे। दृश्य कला, विशिष्ठ लोक चित्रकला, कठिन शास्त्रीय गायन नृत्य एवं विशिष्ठ वाघ यंत्रों के गायन की परम्परा तथा पारम्परिक कला विधाओं से उदियमान कलाकारोंको परिचित कराना है।
गुरू-शिष्य परम्परा योजना विशिष्टकला विधा के लिए दो वर्षों की होगी तथा आवश्यकतानुसार उसे एक वर्ष के लिए अतिरिक्त समय दिया जायेगा। इस विधा में 4 से 5 लोगों को चयनित किया जायेगा। एकविशेषज्ञों की समिति का गठन होगा जिसे सांस्कृतिक केन्द्रों की कार्यक्रम समिति गुरू को निर्धारित करेगी। गुरू विशेषज्ञ समिति के द्वारा शिष्यों का चयन करेगी।
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