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नाट्य पुनरूत्थान योजना

 
 

नाटक का प्रचार प्रसार

   
 

भरत मुनी के नाट्य शास्त्र के अनुसार नाट्य कला अपने आपमें एक परिपूर्ण कला है। जिसमें कला के सभी प्रकार यथा- नृत्य, नाट्य, संगीत, स्थापत्य एवं चित्र समाहित है। नाटक ने समाज में रचात्मक कार्यों का माहौल बनाने के साथ व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण कार्य किया है। नाटक में विश्व इतिहास को समृद्ध करने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जिसके कारण ही हम संस्कृत एवं लोक नाटयो की एक दीर्घ परम्परा को हमारे देश में देख पाते है। हमारे देश में लगभग हर प्रदेश में 2-3 पारम्परिक लोक नाट्य परम्पराए अभी भी मौजुद है।

पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, उदयपुर ने अपनी स्थापना से ही नाट्य कला के विकास एवं उत्थान में गहरी रूची लेते हुए रंग आन्दोलन को सक्रिय किया है। जिस हेतु हमने रंगकर्मियों, निदेशकों एवं प्रतिभावान कलाकारों को नाट्य मंचन हेतु सुविधाएं दी है। इस लोक प्रिय कला शैली को वर्तमान एवं भावी पीढी तक पहुंचाना और उनमें प्रचारित करना आवश्यक है। साथ ही यह भी जरूरी है कि नाट्य जगत में प्रबुद्ध एवं वरिष्ठ रंगकर्मी जो प्रयोग कर रहे है उन्हें प्रचारित किया जाए। अत: इस प्रकार के नए प्रयोग, प्रायोगिक नाट्य समारोह के माध्यम से प्रतिभावान रंगकर्मियों तथा अन्य रंगकर्मियों तक पहुंचाये जाये ताकी वह इन्हें समझे और विकसित करें। इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि उन रंगकर्मियों को जिन्हें नाट्य प्रशिक्षण प्राप्त करने के अवसर प्राप्त नही होते है उन्हें सघन नाट्य प्रशिक्षण शिविरों के माध्यम से नाट्य के विभिन्न तत्वों यथा अभिनय, शारीरिक संचालन, ध्वनी एवं संवाद, नाट्य सामग्री, वेशभूषा, मंच सज्जा एवं निर्माण, प्रकाश परिकल्पना तथा निर्देशन में प्रशिक्षित किया जाए।

इस उद्देश्य की प्राप्ती हेतु पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र निम्न कार्यक्रमों का आयोजन करता है

 

1- नाट्य समारोह / उत्सव
2- रंग परम्परा (लोक नाट्य समारोह)
3- रंगायन (प्रायोगिक नाट्य समरोह)
4- सघन नाट्य (प्रशिक्षण शिविर)

 

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